May 28, 2012

सडक-रेल छाप नोट्स

सडक किनारे पंजाबी, चाइनीज, दक्षिण भारतीय खाने की दुकानों, आइसक्रीम, सोडा के ठेलों के ठीक बगल में, पडे रहते हैं तम्‍बू ताने लोग अपनी रोटी खाते भात पकाते, इतने करीब की हमारी कुर्सी और उनकी टूटी खटिया में दो चार हाथ की ही दूरी रहती है। जमीन में उनके बच्‍चे, महिलाऍं सोते रहते हैं। कभी-कभी हाथ में रोटी लेकर खाते बच्‍चे। पता नहीं किस चीज से खाते रहते हैं रोटी। गंदे गंदे से दीखते उनके बूढे बूढियां बाल उलझाए। अपनी हड्डियां दिखाते, बीडी फूंकते बैठे रहते हैं। गर्मी से बेहाल रात बढने, रात के साथ मौसम ठंडा होने के इंतजार में।
ये चीजें हमेशा ध्‍याना खींचती हैं। गरीबी और बीमारी निराश करती हैं। इसलिए हम इनसे बचकर निकलना चाहते हैं। नोटिस सब करते हैं। निराश इसलिए करती हैं कि मन में कहीं न कहीं यह बात होती है कि किसी भी इंसान की स्थिति वैसी हो सकती है। किसी भी इंसान में हम खुद भी शामिल हैं। 


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साल में एक दो बार कटनी स्‍टेशन से गुजरते वक्‍त अकसर उस बुक स्‍टॉल पर जिसमें साहित्यिक किताबें रखी होती हैं खासकर हिन्‍दी की, पूछ लिया करता था कुछ किताबों के बारे में जिन्‍हें खरीदना चाहता था। 2-3 सालों में पहली बार उस बुक स्‍टॉल पर 'काशी का अस्‍सी' उपलब्‍ध थी।  यह किताब अकसर मैं बुक स्‍टालों पर पूछता रहता था लेकिन नहीं मिलती थी। अभी शायद किताबें उतरी ही थीं। सामने ही रखी थी। इसके साथ ही काशीनाथ सिंह की 'रेहन पर रग्‍घू' और 'घर का जोगी जोगडा' भी मिलीं। मनोहर श्‍याम जोशी की 'हरिया हक्‍यूलिस की हैरानी' और 'क्‍याप' भी ली। हरिया हक्‍यूलिस की हैरानी पुस्‍तकालय से लेकर पढ चुका हूँ। मैं ज्‍यादातर पुस्‍तकें पुस्‍तकालय से लेकर ही पढता हूँ। लेकिन पुस्‍तकालय बहुत सी पुस्‍तकें नहीं मिलती जिन्‍हें आप पढना चाहते हैं। नई पुस्‍तकें भी पुस्‍तकालय में नहीं मिलतीं। ज्ञान चतुर्वेदी की 'मरीचिका' भी ली। ज्ञान चतुर्वेदी की 'बारहमासी' और 'नरकयात्रा' पढने के बाद उनकी अगली पुस्‍तक लेने से रोक पाना असंभव है। ज्ञान चतुर्वेदी श्रीलाल शुक्‍ल की परंपरा को कायम रखे हुए हैं।


मजेदार बात यह हुई की पुस्‍तकें चयनित करते करते ट्रेन चल दी। अभी मैं कुछ और पुस्‍तकों के लेने न लेने का विचार कर रहा था लेकिन ट्रेन लुढकने लगी तो जो भी थीं उनके पैसे जल्‍दी से देकर ट्रेन की तरफ रुख किया इतने में ट्रेन रुक गई। तस्‍लीमा नसरीन की एक मोटी सी किताब मुझे लगा कि मैं पुस्‍तकालय से लेकर पढ चुका हूं जो कि कॉफी महँगी भी थी। मैंने दुकानदार को उसकी जगह दूसरी किताबें देने को कहा। उसने पैसों का हिसाब लगाकर किताबें दीं। अभी उसके 5 रुपए नहीं एडजस्‍ट हो रहे थे कि ट्रेन फिर चल दी। मैंने उसे अगली बार देने को कहकर ट्रेन में चढ गया।  इसके पहले उसने 10 रुपए मुझ पर टिकाया था।

April 30, 2012

नया खिलौना

नया खिलौना मैंने पाया
मेरे मन को है यह भाया

खेलूं मैं इससे सारा दिन
रहूं नहीं पल भर इसके बिन

बच्‍चों को जब इसे दिखाया
सबके मन में लालच आया 

April 21, 2012

इंट‍रमिशन के बाद : अन्‍ना-बाबा लाइव

कल अन्‍ना हजारे और बाबा रामदेव को टीवी पर लाइव पत्रकार वार्ता करते पाया। जिसका अंदेशा था वह हुआ। कहीं कुछ बिखरा।

यह एक ऐसा आंदोलन(?) था जिसमें हम टीवी और इंटरनेट के माध्‍यम से शामिल थे। हमने इंडिया अंगेन्‍स्‍ट करप्‍शन की साइट को लाइक‍ किया। हमने अन्‍ना की फोटो लगाई अपनी फेसबुक की वाल पर। हमने ट्वीट और रिट्वीट किया अन्‍ना के पक्ष में। उस समय आंदोलन और अन्‍ना एक दूसरे के पर्याय थे। हमने न्‍यूज चैनलों पर डटकर अन्‍ना के अनशन का लाइव देखकर उनकी टीआरपी बढाई। कुछ लोगों ने हमसे ज्‍यादा किया। मैदान में गए भाषण सुने। नारे लगाए। टोपी पहनी। बाइट दिया। अपनी हैसियत के अनुसार फुटेज खाई। कुछ लोगों का आरोप था कि इन लोगों ने आइसक्रीम,गोल गप्‍पे और चाट वगैरह भी खाई। 

April 16, 2012

अवांछित पंक्तियां

प्रेम में प्रेम भी है
कविता में अब भी कुछ कविता बची हुई है
ऐसा लगता है
शब्‍दों का सम्‍मान हमारी दगाबाजी का
निहायत जरुरी हिस्‍सा है 
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February 14, 2012

डे फे से

मैं इतने जोर से हाथ घुमाऊँगा 
कि एक तमाचे के बराबर ऊर्जा मुक्‍त हो 
तमाचा किसी को लगे भी न और 
मुझे संतोष हो जाए कि मैंने 
जोरदार विरोध प्रकट कर दिया